वर्तमान अफगानिस्तानी घटना से प्राचीन भारतीय आक्रमणों की तुलना

वर्तमान अफगानिस्तानी घटना से प्राचीन भारतीय आक्रमणों की तुलना :- 


 अफगानिस्तान में हो रहे नरसंहार और ज्यादतियों का वर्णन और स्मरण करना बेहद खौफजदा हैं



जैसी सूचनाएं मिडिया के माध्यम से मिल रही है उसके अनुसार ना केवल अफगानिस्तान वल्कि मानवता खतरे में है ।

हमारी मानसिक विकृतियां इतनी बढ़ चुकी है की धर्म,जाति,समुदाय और आपसी स्वार्थ के चक्कर में हम ईश्वर के नायाब तोहफे इन्सानियत को भूलते जा रहे हैं।

यह लिखना दुखद है परन्तु वर्तमान अफगानिस्तान की स्थिति को देखकर मैं हमारे भारत के हजारों वर्षों की गुलामी के बारे में सोचकर स्तब्ध हूं कि हमारे पूर्वजों ने आखिर कैसे क्रुर,निर्दयी , आक्रमणकारियों , शासकों का सामना और ऐसी गुलामी में जीवन-यापन कैसे किया होगा ।

 लगभग 20 सालों से  अमेरिका जैसी विश्व शक्ति का समर्थन और आधुनिक हथियार होने  के बाद भी  अफ़ग़ानिस्तान को 20 दिनो मे ही हार का मुंह देखना पड़ा और नतमस्तक होकर गुलामी और नरसंहार से रूबरू होना पड रहा है । तो भारत ने हमेशा पारम्परिक हथियारों तीर ,कमान, तलवार ,भालों से विदेशी आक्रांताओं जो की विदेशी हथियारों से लडा करते थे उनका कैसे सामना किया होगा ।


जब मेरे ज़हन में यह बात आती हैं कि हज़ारों सालो की लूट , विदेशी क्रुर शासकों के आक्रमणों, इस्लामिक बर्बरता ,और अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी  हमारे पूर्वजों ने सही होगी तो दिल दहल उठता है! 

वास्तव में उनके अदम्य साहस और पराक्रम, बलिदान को शत-शत नमन है जो ऐसी हालातों में हिम्मत नहीं हारे होगे और आखिरी सांस तक लडे होंगे ।

सैल्यूट है उन यौद्धाओं को जिन्होंने ऐसे क्रुर आक्रमणकारियों को मुंहतोड़ जवाब दिया होगा ।

वो महान लोग किसी भी जाति या समुदाय से क्यों न हो लेकिन उनके अदम्य साहस और बलिदान के कारण ही आज हम हैं! वर्तमान में जो वहाँ अफगानिस्तान में हो रहा हैं उसको देख कर समझ आता हैं कि इस्लामिक आक्रांताओं की लूट के समय देश में क्या स्थिति रही होगी ? 



आख़िर कैसे जब मक्का से इंसानी खून की प्यासी मुस्लिम आक्रांताओ की तलवार लपलपाते हुए निकली थी तो एक झटके में ही ईरान, इराक, सीरिया, मिश्र, दमिश्क,अफगानिस्तान, कतर, बलूचिस्तान से लेकर के मंगोलिया और रूस तक ध्वस्त होते चले गए थे उन देशों में स्थानीय धर्मों परम्पराओं का समाप्त कर शिरयत_कानून लागू हो गया और बड़ी शान से इस्लाम का झंडा आसमान चूमता हुआ अफगानिस्तान होते हुए सिंध के रास्ते भारत पहुंचा ।

यकिनन उस समय बहुत भयंकर रक्तपात हुआ होगा जैसा हम आजकल इतिहास में पढ़ते है या फिर  उससे भी बड़ा नरसंहार और निर्ममता का परिचायक रहा होगा ।

देश के  तात्कालिक सैनिक ,युवा , बुजुर्ग, महिलाओं ने अनन्त दुखों को सहन किया होगा ।

सैनिकों और युवाओं के लहू से धरती लथपथ रही होगी ।


विधवाओं का अंबार लग गया  होगा .! इसी वजह से सती प्रथा जौहर जैसी प्रथाएं आकार लेने लगी होगी क्योंकि देश की स्वभाविमानी माता बहने कतई यह स्वीकार नहीं करती की उनके जीवनकाल में किसी पर-पुरुष की छाया भी पड़े ।

क्योंकि आक्रमणकारी ना केवल धन, वैभव को लूटते बल्कि  महिलाओं और बच्चियों को प्रताड़ित करते और अपने मुल्क ले जाते थे।

सोचिए  जरा इन क्रूर 1000 वर्षों में कितना संघर्ष किया होगा हमारे पूर्वजों ने  कितना असहनीय दुःख और यातनाएं सहन की होगी उन्होंने !



वर्तमान में अफगानिस्तान पर इस विपदा का मुख्य कारण जाति, धर्म और समाज की लडाई मुख्य कारण रही इसका वीजारोपण राजनीतिक लोगों और धर्म के ठेकेदारों ने किया और धीरे-धीरे संघर्ष बढ़ने लगा राजनैतिक तंत्र विफल होता गया और तालिबानियों ने मौका देखकर आक्रमण कर दिया ।

यदि देखा जाये तो जाति , धर्म,एक दूसरे से ईर्ष्या भाव सबसे बड़ा संकट है किसी भी समाज के लिए या फिर किसी राज्य या देश के लिए यही भेदभाव दूर होना परम आवश्यक है ।


Note :- यह मेरे व्यक्तिगत विचार है किसी धर्म ,जाति ,समाज को निचा दिखाना या निन्दा करना मेरा उद्देश्य नहीं है 



राजीव बगलाई (ब्लॉग राइटर)

Research student in History (UOK)

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