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मराठा छावा(CHHAVA) शम्भाजी महाराज

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  छावा   छत्रपति शंभाजी महाराज: शौर्य, विद्वत्ता और बलिदान की अमर गाथा भारत के इतिहास में कई महान योद्धाओं ने अपने साहस, नीति और बलिदान से अमिट छाप छोड़ी है। ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थे छत्रपति शंभाजी महाराज, जो मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति और छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे। शंभाजी महाराज केवल एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक, विद्वान और स्वाभिमान के प्रतीक थे। प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा शंभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। वे बचपन से ही अद्भुत बुद्धिमत्ता और शौर्य के लिए प्रसिद्ध थे। शंभाजी महाराज ने संस्कृत, फारसी और मराठी सहित कई भाषाओं में प्रवीणता हासिल की थी। उन्होंने 'बुद्धभूषण' जैसे ग्रंथों की रचना की, जो उनकी विद्वत्ता का प्रमाण है। - शासन और युद्ध कौशल शिवाजी महाराज के निधन के बाद, शंभाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। उस समय औरंगज़ेब के नेतृत्व में मुगल साम्राज्य मराठों को समाप्त करने की पूरी कोशिश कर रहा था। मुख्य उपलब्धियाँ : मुगलों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शंभाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा की। ...

वर्तमान अफगानिस्तानी घटना से प्राचीन भारतीय आक्रमणों की तुलना

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वर्तमान अफगानिस्तानी घटना से प्राचीन भारतीय आक्रमणों की तुलना :-   अफगानिस्तान में हो रहे नरसंहार और ज्यादतियों का वर्णन और स्मरण करना बेहद खौफजदा हैं जैसी सूचनाएं मिडिया के माध्यम से मिल रही है उसके अनुसार ना केवल अफगानिस्तान वल्कि मानवता खतरे में है । हमारी मानसिक विकृतियां इतनी बढ़ चुकी है की धर्म,जाति,समुदाय और आपसी स्वार्थ के चक्कर में हम ईश्वर के नायाब तोहफे इन्सानियत को भूलते जा रहे हैं। यह लिखना दुखद है परन्तु वर्तमान अफगानिस्तान की स्थिति को देखकर मैं हमारे भारत के हजारों वर्षों की गुलामी के बारे में सोचकर स्तब्ध हूं कि हमारे पूर्वजों ने आखिर कैसे क्रुर,निर्दयी , आक्रमणकारियों , शासकों का सामना और ऐसी गुलामी में जीवन-यापन कैसे किया होगा ।  लगभग 20 सालों से  अमेरिका जैसी विश्व शक्ति का समर्थन और आधुनिक हथियार होने  के बाद भी  अफ़ग़ानिस्तान को 20 दिनो मे ही हार का मुंह देखना पड़ा और नतमस्तक होकर गुलामी और नरसंहार से रूबरू होना पड रहा है । तो भारत ने हमेशा पारम्परिक हथियारों तीर ,कमान, तलवार ,भालों से विदेशी आक्रांताओं जो की विदेशी हथियारों से लडा करत...

उदयपुर, राजस्थान Udaipur, Rajasthan द सिटी ऑफ लेक(झीलों की नगरी) के पर्यटन स्थल tourist places

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उदयपुर, राजस्थान  Udaipur, Rajasthan  द सिटी ऑफ लेक(झीलों की नगरी) के पर्यटन स्थल झीलों की नगरी के रूप में प्रतिष्ठित उदयपुर, मेवाड़ के राणा लाखा के शासन काल में निर्मित पिछौला झील के तट पर स्थित है यह शहर अरावली पर्वत श्रैणी की पहाड़ियों से घिरा हुआ है तथा हर तरफ हरी भरी वादियों से घिरा है जिनके बीच मनमोहक झीलें पर्यटकों का मन मोह लेती है । यहां का दृश्य देखने लायक होता है इस लिए प्रतिवर्ष देशी विदेशी पर्यटक यहां भ्रमण के लिए आते हैं तथा अपने साथ  लेक सिटी की यादें ले जाते है । उदयपुर ना सिर्फ प्राकृतिक रूप से बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी उतना ही महत्वपूर्ण है यहां स्थित ऐतिहासिक धरोहर भी पर्यटकों को आकर्षित करती है। तथा यहां की कला संस्कृति और यहां का राजस्थानी भोजन भी बहुत प्रसिद्ध है । यही कारण है कि उदयपुर को  "पूर्व का वेनिस" भी कहा जाता है । यहां पर्यटकों को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील जयसमंद झील भी स्थित है जो भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।  स्वतंत्रता से पूर्व मेवाड़ की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित इस ऐतिहासिक नगर की स्थापना मेवाड़ क...

Kota Smart City ,Rajasthan कोटा स्मार्ट सिटी,राजस्थान

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कोटा स्मार्ट सिटी, राजस्थान Kota Smart City, Rajasthan Sevan Wonders कोटा  को भारत की शिक्षा नगरी कहा जाता है । देश के कोने कोने से कोटा में विधार्थी मेडिकल और इंजीनियरिंग से संबंधित शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष आते हैं । कोटा राजस्थान के पर्यटन स्थलों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है यहां देशी विदेशी पर्यटक बड़ी तादाद में भ्रमण के लिए आते हैं। कोटा सिटी का इतिहास :-  बाहरवीं शताब्दी मे राव देवा ने जैता मीणा पर विजय प्राप्त कर बूंदी मे हाडा शासन की नींव डाली थी,   तत्पश्चात बूंदी के राजकुमार को कोटा की जागीरी प्राप्त हुई थी। सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राव माधोसिंह ने 'राजस्थान का कानपुर' व 'उद्योगों का शहर कोटा के स्वंत्रत राज्य की स्थापना की जिसे मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा मान्यता प्राप्त हुई।  राव माधोसिंह ने चंबल नदी के तट पर वर्तमान में 'गढ़ पैलेस' के नाम से प्रसिद्ध महल की नींव रखी। यह विशाल परिसर, जिसे सिटी पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, प्रमुखतः राजपूत स्थापत्य शैली में बनाया गया है। महाराव माधो सिंह संग्रहालय गढ़ की दीवारों के भीतर स्थित है, जो कोटा ...

9अगस्त विश्व आदिवासी दिवस के तथ्य जानें ! International Day of the World's Indigenous Peoples

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9अगस्त (  विश्व आदिवासी दिवस ) जय जोहार , जय आदिवासी International Day of the World's Indigenous Peoples  सर्वप्रथम आदिवासी दिवस  संयुक्त राज्य अमेरिका में 1982 में मनाया गया था। इस दिन से ही विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत हुई थी। आदिवासी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हैं “आदि” और “वासी” जिसका अर्थ होता हैं "निवासी या मूलनिवासी"।  आदिवासियों का प्रसिद्ध नारा " जय जोहार " का नारा है जिसका अर्थ सभी का कल्याण करने वाली प्रकृति की सदैव जय हो । अतः आदिवासियों का प्रकृति के प्रति स्नेह को यह नारा भली-भांति परिभाषित कराता है  भारत में तक़रीबन 8 प्रतिशत जनसँख्या आदिवासी हैं। 8 प्रतिशत यानी करीब 10 करोड़।  तथा राजस्थान में आदिवासी वर्ग के लोगों की संख्या राजस्थान की कुल आबादी का 12.6% यानी करीब 86 लाख है.। 09 अगस्त को पूरा विश्व The International Day of the World's Indigenous Peoples भारत मे इसे "विश्व आदिवासी दिवस" के तौर पर मनाता है फिर भी भारत के संविधान में Indigenous शब्द को अभी तक नही जोड़ा गया यानी भारत में आदिवासी समुदाय की सम्पूर्ण पहचान ही उनसे छिपा ...

माउन्ट आबू , सिरोही, राजस्थान Mount Abu , Sirohi , Rajasthan

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माउन्ट आबू , सिरोही, राजस्थान  माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है । जो कि अरावली पर्वत श्रंखला के सर्वाधिक ऊंचे पठार पर स्थित है माउन्ट आबू अपनी ठंडी और शांत वातावरण के लिए राजस्थान के पर्यटकों की पहली पसंद हैं माउंट आबू के पठार से देखने पर यहां के पहाड़ों एवं मैदानी क्षेत्रों की हरियाली पर्यटकों का मन मोह लेती है एवं यहां के अन्य पर्यटक स्थल भी पर्यटकों को बेहद आकर्षित करते हैं माउन्ट आबू में अवस्थित ऐतिहासिक  दिलवाड़ा जैन मंदिर, नक्की झील नौकायान के लिए , सनसेट पॉइंट, एवं हनीमून पॉइंट  लोकप्रिय है यही कारण है कि यह  राज्य का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। माउन्ट आबू के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटक स्थल:-  ✓  नक्की झील  :-  यह राजस्थान की सबसे ऊंचाई पर अवस्थित झील है।   यह झील आबू पर्वत की सबसे मनमोहक झील  है।  कहा जाता है कि इस को देवताओं ने अपने नाखूनों से खोदा था इसीलिए इसका नाम नक्की  झील पड़ा।  जबकि ग्रामीणों की मान्यता है कि रसिया बालम नाम के व्यक्ति ने राजकुमारी से विवाह की शर्त पर इसे रातों-...

चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान chittorgarh fort Rajasthan

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चित्तौड़ का किला, चित्तौड़गढ़, राजस्थान चित्तौड़गढ़ दुर्ग चित्तौड़गढ़ का किला राजस्थान के इतिहास में दुर्गों का सिरमौर कहना ग़लत नहीं होगा क्योंकि चित्तौड़गढ़ का किला सभी महत्वों को ध्यान में रखकर बनाया गया था  सामरिक रूप से भी इस किले को महत्वपूर्ण माना जाता है इसी कारण राजस्थान में कहावत कही जाती है कि 'गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ेया।'  चित्तौड़दुर्ग  मौर्य शासक चित्रांग मोर्य ने मेसा के ऊंचे पठार पर गम्भीरी और बेडच नदीयों के संगम पर बनाया गया था। तथा इसका क्षेत्रफल 28 वर्ग कि.मी. है एवं दुर्ग की परिधि लगभग 13 कि.मी. है।  राजस्थान के किलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा चित्तौड़ का किला है। इसे भारत का सबसे लम्बा किला भी कहा जाता है।  राजस्थान का यह एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसके लिए सर्वाधिक युद्ध लडे गये ।  सन 1303 ई.में अलाउद्दीन खिलजी ने रावल रतनसिंह को मारकर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया था ।  चित्तौड़गढ़ के इतिहास का यह एक महत्वपूर्ण युद्ध था जिसमें राजपूत वीरों  ने  सेनापति गोरा और बादल के नेतृत्व में केसरिया किया और रानी पद्म...